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प्राचीन काल में पाठ्य-विषय पृथक-पृथक नहीं पढ़ाये जाते थे, अपितु समन्वित ढंग से पढ़ाने का प्रचलन था । शिक्षा के पाठ्यक्रम को प्रकृति के आधार पर दो प्रकारों में विभक्त किया गया था –

(अ) परा (आध्यात्मिक) विद्या – इसके अंतर्गत वैदिक साहित्य जैसे वेद, वेदांग, उपनिषद,
दर्शन, पुराण आदि का अध्ययन किया जाता था । यज्ञ तथा अन्य संस्कार विधियों का
प्रयोगात्मक ज्ञान भी प्रदान किया जाता था । (ब) । अपरा (लौकिक) विद्या – इसमें इतिहास, तर्कशास्त्र, भूगर्भशास्त्र, वनस्पति विज्ञान,
चिकित्सा शास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र, कृषि, गौ-पालन, शिल्पकला तथा ललित कलाओं का अध्ययन किया जाता था । शिक्षा का माध्यम संस्कृत भाषा थी अत:
संस्कृत का उत्तम ज्ञान आवश्यक था। 5.2.6 शिक्षण विधियाँ
प्राचीन काल में शिक्षण कार्य मुख्य रूप से प्रत्यक्ष विधियों द्वारा किया जाता था । शिक्षा की प्रक्रिया में शिक्षक का स्थान सर्वोपरि होता था । शिक्षक वैदिक मन्त्रों का गायन एवं व्याख्या करता था । इसके द्वारा शिक्षक छात्रों को सही-सही पढ़ने तथा अर्थ समझने का अभ्यास करवाता था । शिक्षक छात्रों को उनकी योग्यता के अनुसार तीन वर्गों में विभाजित कर लेता था । सर्वाधिक मानसिक योग्यता वाले छात्र महाप्राज्ञ, औसत मानसिकता वाले छात्र मध्यमप्राज्ञ तथा निम्न मानसिकता वाले छात्र अल्पप्रज्ञ कहलाते थे । प्राचीन काल की शिक्षण विधियाँ मुख्य रूप से मौखिक थी । इस काल में कक्षा में छात्रों की संख्या कम होती थी अत: गुरू प्रत्येक छात्र पर व्यक्तिगत ध्यान दे सकता था । इस सम्बन्ध में डा० अल्टेकर का मत है”प्राचीन भारत में कक्षाएँ छोटी होती थी और उनमें 15 या 20 छात्रों से अधिक नहीं थे, अत: शिक्षक द्वारा प्रत्येक छात्र के प्रति व्यक्तिगत ध्यान दिया । होते जाना सम्भव था ।” ये शिक्षण विधियाँ इस प्रकार हैं – 1. अनुकरण एवं कण्ठस्थ विधि – प्राचीन काल में अनुकरण विधि को प्रारम्भिक स्तर पर
भाषा तथा व्यवहार की शिक्षा के लिए प्रयुक्त किया गया था | उच्च स्तर पर अनुकरण विधि का प्रयोग वेद मन्त्रों के उच्चारण के लिए किया जाता था । पहले गुरू शिष्यों के सामने वेद मन्त्रों का उच्चारण करते थे, शिष्य उसे ध्यान से सुनकर उसी के अनुसार स्वयं उच्चारित करते थे । शिष्य बार-बार अनुकरण करने के पश्चात् मन्त्रों को
कण्ठस्थ कर लेते थे । 2. उदाहरण सहित व्याख्या विधि – गुरू शिष्यों को मन्त्रों को कण्ठस्थ करवाने के बाद
उसका अर्थ एवं भाव स्पष्ट करते थे | व्याख्या करने के लिए विभिन्न उपमा, रूपक । तथा उदाहरणों का प्रयोग किया जाता था । वाद-विवाद और शास्त्रार्थ विधि – उच्च शिक्षा के लिए शास्त्रार्थ समूह (Debating groups) तथा सम्मेलनों (Conferences) का आयोजन किया जाता था । पाठ्यविषय सम्बन्धी शंकाओं के समाधान के लिए गुरू एवं शिष्यों के समूह अपने-अपने
ज्ञान का प्रदर्शन करते थे और विचार-विमर्श करते थे । 4. प्रदर्शन विधि – कृषि, गौ-पालन, कला-कौशल एवं सैन्य- शिक्षा जैसे किया प्रधान विषयों
की शिक्षा प्रदर्शन विधि द्वारा दी जाती थी । इनसे संबंधित कियाओं को पहले गुरू शिष्य के सम्मुख करके दिखाते थे, तत्पश्चात् शिष्य उस किया का अभ्यास करते थे ।
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5. श्रवण-मनन एवं निदिध्यासन – इस विधि में छात्र गुरू द्वारा दिये गये उपदेशों को
ध्यानपूर्वक सुनकर उन पर मनन करते थे । भलीभाँति चिन्तन एवं मनन करने के
पश्चात् उसका नियमित अभ्यास करते थे । 6. तर्क विधि – प्राचीन काल में तर्कशास्त्र जैसे विषय के शिक्षण के लिए तर्क विधि का
प्रयोग किया जाता था । इस विधि के पाँच पद थे । प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, अनुप्रयोग
तथा निगमन ।। 7. कहानी कथन विधि – विष्णु शर्मा ने नीति की शिक्षा प्रदान करने के लिए पंचतन्त्र एवं
हितोपदेश जैसी कहानियों की रचना की थी । गुरू शिष्यों को कहानी सुनाने के बाद प्रश्न पूछते थे ।
स्वमूल्यांकन प्रश्न 1.गुरूकुल में कौन-कौन सी शिक्षण विधियाँ प्रयुक्त की जाती थीं? 2.श्रवण-मनन एवं निदिध्यासन का अर्थ है? 3.शास्त्रार्थ विधि से आप क्या समझते हैं?
5.2.7 अनुशासन
प्राचीन काल में अनुशासन का अर्थ था- शारीरिक, मानसिक और आत्मिक संयम । ब्रह्मचर्य का पालन कार नहीं करना, सुगंधित पदार्थों का प्रयोग नहीं करना, नृत्य संगीत में रूचि नहीं लेना, मादक पदार्थों का सेवन नहीं करना, जुआ नहीं खेलना, गाय को नहीं मारना, झूठ नहीं बोलना और निन्दा नहीं करना आदि को शारीरिक संयम कहा गया । मानसिक संयम का तात्पर्य था – इंद्रिय निग्रह, सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह । आत्मिक संयम का अर्थ था – आत्मा के स्वरूप को पहचानना, सब में समभाव रखना और सबके कल्याण के लिए कार्य करना । गुरू के आदेशों का पालन तथा गुरूकुल के नियमों का पालन भी अनुशासन का ही एक रूप था । अनुशासन में नहीं रहने पर दण्ड का विधान था किन्तु कठोर शारीरिक दण्ड देने की प्रथा नहीं थी । दण्ड उपवास के रूप में दिया जाता था । 5.2.8 गुरू-शिष्य सम्बन्ध
गुरू तथा शिष्य के बीच अत्यधिक मधुर सम्बन्ध ही प्राचीन कालीन शिक्षा की सर्वश्रेष्ठ विशेषता कही जा सकती है । गुरू समस्त शिष्यों को पुत्रवत मानता था तथा समस्त शिष्य गुरू को पिता तुल्य मानते थे, गुरू शिष्यों के साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार करते थे तथा शिष्य गुरू के प्रति असीम श्रद्धा रखते थे । गुरूकुल की व्यवस्था गुरू एवं शिष्य संयुक्त रूप से करते थे । गुरू-शिष्य के बीच इतने मधुर सम्बन्धों का आधार उनके पारस्परिक कर्तव्य थे । जैसे – (अ) गुरुओं के प्रति शिष्य के कर्तव्य – शिष्य गुरु के प्रति पूर्णतः समर्पित थे तथा
निम्नलिखित कर्तव्यों का पालन करते थे –
गुरूकुल की सफाई करना, पूजा पाठ की व्यवस्था करना । (2) गुरुकुल वासियों के लिए भिक्षा माँग कर लाना ।
(1)
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(3) । भोजन के लिए लकड़ी चुन कर लाना । (4) पशुओं को चराना, तथा पानी भरना । (5) गुरू के रात्रि विश्राम की व्यवस्था करना । (6) गुरुओं के सोने से पहले पैर दबाना । (7) गुरू के आदेश का निष्ठापूर्वक पालन करना ।
(8) शिक्षा पूर्ण होने पर सामर्थ्यानुसार गुरू दक्षिणा देना । (ब) शिष्यों के प्रति गुरुओं के कर्तव्य | (1) शिष्यों के भोजन का प्रबन्ध करना । (2) शिष्यों के स्वास्थ्य की देखभाल करना तथा अस्वस्थ होने पर उपचार
शिष्यों को सदाचरण की शिक्षा प्रदान करके उनका चारित्रिक उत्थान।
शिष्यों को निषिद्ध कर्म करने से रोकना ।। (5) शिष्यों का सर्वांगीण विकास करना । (6) शिक्षा पूर्ण होने पर शिष्यों को गृहस्थ जीवन में प्रवेश की आज्ञा देना ।

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